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Thursday, September 9, 2010
बेकार ज़िन्दगी का ज़िक्र छेड़ दिया...
काबिल-ए-ज़िक्र इसमें अब बचा क्या है..
चाँद टूटे हुए ख्वाब के किस्से..
कुछ अरमान अधूरे बिलखते हुए..
ऐसे आंसू जो आँख ही में सूख गए..
एक अहसास जो महसूस भी ना हो पाया...
ज़िन्दगी जैसे हो सूखी हुई नदी कोई...
ठहर गयी है एक मकाम पे आकर...
बेकार ज़िन्दगी का ज़िक्र छेड़ दिया..
काबिल-ए-ज़िक्र , इसमें अब बचा क्या है..
रह रह के धुँआ उठता है खयालो का...
जाने सीने में आजकल सुलगता क्या है...
अवि,
काबिल-ए-ज़िक्र इसमें अब बचा क्या है..
चाँद टूटे हुए ख्वाब के किस्से..
कुछ अरमान अधूरे बिलखते हुए..
ऐसे आंसू जो आँख ही में सूख गए..
एक अहसास जो महसूस भी ना हो पाया...
ज़िन्दगी जैसे हो सूखी हुई नदी कोई...
ठहर गयी है एक मकाम पे आकर...
बेकार ज़िन्दगी का ज़िक्र छेड़ दिया..
काबिल-ए-ज़िक्र , इसमें अब बचा क्या है..
रह रह के धुँआ उठता है खयालो का...
जाने सीने में आजकल सुलगता क्या है...
अवि,
Sunday, August 29, 2010
कहीं ऐसा तो नहीं...
तुम्हे मुझसे मुहब्बत तो नहीं....
मैंने देखा है इन निगाहों ने...
उठती गिरती हुई पलकों का सहारा लेकर..
मुझसे कुछ कहने की नाकाम सी कोशिश की है..
हाले दिल बयाँ किया , कभी ख़ामोशी तो कभी मुझसे...
कुछ और देर ठहर जाने की गुज़ारिश की है...
लबों से कुछ न कहा तुमने लेकिन...
मैं सोचता हूँ निगाहों में हकीकत तो नहीं...
कहीं ऐसा तो नहीं, तुम्हे मुझसे मुहब्बत तो नहीं....
कांपते हाथो ने तेरे थामी कलम,
दिल को अपने , कागज़ पे यूँ उतारा है,
लकीरें खींची फूल बनाएं, शेर लिक्खे हैं...
टेढ़ी मेढ़ी सी उन लकीरों में, तेरे शेरो में और फूलों में..
मेरा ही अक्स उभरता है ये लगता है...
तुने मेरे ही लिए ये कागज़ सभी सजाये है...
दामन में उलझी ऊँगलिया देखी तो ये महसूस किया...
तेरे हाथों को कहीं मेरे सहारे की जरूरत तो नहीं...
कहीं ऐसा तो नहीं..
तुझे मुझसे मुहब्बत तो नहीं....
अविनाश ....
तुम्हे मुझसे मुहब्बत तो नहीं....
मैंने देखा है इन निगाहों ने...
उठती गिरती हुई पलकों का सहारा लेकर..
मुझसे कुछ कहने की नाकाम सी कोशिश की है..
हाले दिल बयाँ किया , कभी ख़ामोशी तो कभी मुझसे...
कुछ और देर ठहर जाने की गुज़ारिश की है...
लबों से कुछ न कहा तुमने लेकिन...
मैं सोचता हूँ निगाहों में हकीकत तो नहीं...
कहीं ऐसा तो नहीं, तुम्हे मुझसे मुहब्बत तो नहीं....
कांपते हाथो ने तेरे थामी कलम,
दिल को अपने , कागज़ पे यूँ उतारा है,
लकीरें खींची फूल बनाएं, शेर लिक्खे हैं...
टेढ़ी मेढ़ी सी उन लकीरों में, तेरे शेरो में और फूलों में..
मेरा ही अक्स उभरता है ये लगता है...
तुने मेरे ही लिए ये कागज़ सभी सजाये है...
दामन में उलझी ऊँगलिया देखी तो ये महसूस किया...
तेरे हाथों को कहीं मेरे सहारे की जरूरत तो नहीं...
कहीं ऐसा तो नहीं..
तुझे मुझसे मुहब्बत तो नहीं....
अविनाश ....
छत पर बैठा दूर फलक में देख रहा हूँ....
एक चाँद है, एक सितारा....
और हजारों मील की दूरी....
बिल्कुल जैसे कमरे के एक कोने में तुम
बिल्कुल जैसे कमरे के एक कोने में मैं...
बीच में पसरी रस्मो रिवाजों की मजबूरी...
अजब बात है, कोई जहाँ हो...
मुश्किलें मुहब्बत का साया ही है...
अविनाश...
एक चाँद है, एक सितारा....
और हजारों मील की दूरी....
बिल्कुल जैसे कमरे के एक कोने में तुम
बिल्कुल जैसे कमरे के एक कोने में मैं...
बीच में पसरी रस्मो रिवाजों की मजबूरी...
अजब बात है, कोई जहाँ हो...
मुश्किलें मुहब्बत का साया ही है...
अविनाश...
Thursday, July 8, 2010
उफ़ के तकलीफ़ बहुत देती है ये हकीक़त ...
के मेरा वजूद आदमी का है...
जिंदगी जीने का मज़ा तो तब था
जब के तमाम दर्द तमाम दिक्कतें ज़हाँ की...
मैं यूं सह पाता जैसे माँ ने सही थी....
ये काँधे इस तरह झुक गए हैं..
ख़ुद अपने ही वज़न से...
के अपने ही क़द की ऊंचाई तलक से नहीं वाकिफ ...
रेंग के बसर होती जिंदगी यूं ही..
मज़ा तो तब था के देर रात दरवाज़े से टिक कर
ख़ुद मैंने कभी माँ की तरह खुद का रास्ता तका होता...
उफ़ के तकलीफ़ तब भी होती है...
मैं सोचता हूँ बे-ख़याल होकर....
नाम भर से ... वजूद मेरा जाहीर है ...
एक औरत की तरह मैं कभी जी पाया ही नही....
Avinash
के मेरा वजूद आदमी का है...
जिंदगी जीने का मज़ा तो तब था
जब के तमाम दर्द तमाम दिक्कतें ज़हाँ की...
मैं यूं सह पाता जैसे माँ ने सही थी....
ये काँधे इस तरह झुक गए हैं..
ख़ुद अपने ही वज़न से...
के अपने ही क़द की ऊंचाई तलक से नहीं वाकिफ ...
रेंग के बसर होती जिंदगी यूं ही..
मज़ा तो तब था के देर रात दरवाज़े से टिक कर
ख़ुद मैंने कभी माँ की तरह खुद का रास्ता तका होता...
उफ़ के तकलीफ़ तब भी होती है...
मैं सोचता हूँ बे-ख़याल होकर....
नाम भर से ... वजूद मेरा जाहीर है ...
एक औरत की तरह मैं कभी जी पाया ही नही....
Avinash
Sunday, April 25, 2010
एक दिन उसने तमन्ना ये की ....
छोड़ के साथ महबूब का , उड़े तनहा ....
रक्स बादलो पे करे
हवा पे लहराए
ऐसी परवाज़ भरे
जोर , जिसपे किसी का ना चले...
उसको देखा भी गया
हवाओं पे बल खाते हुए
साथ परिंदों के लहराते हुए
रक्स बादलो पे करते हुए
कभी गिरते कभी उभरते हुए
खूब परवाज़ थी लेकिन लम्बी न चली
कौन समझाए के पतंग के उड़ने के लिए
डोर का साथ भी ज़रूरी है....
अविनाश
छोड़ के साथ महबूब का , उड़े तनहा ....
रक्स बादलो पे करे
हवा पे लहराए
ऐसी परवाज़ भरे
जोर , जिसपे किसी का ना चले...
उसको देखा भी गया
हवाओं पे बल खाते हुए
साथ परिंदों के लहराते हुए
रक्स बादलो पे करते हुए
कभी गिरते कभी उभरते हुए
खूब परवाज़ थी लेकिन लम्बी न चली
कौन समझाए के पतंग के उड़ने के लिए
डोर का साथ भी ज़रूरी है....
अविनाश
Tuesday, July 28, 2009
बड़ी तमन्ना है कोई शाम ऐसी भी तो हो...
तू सामने बैठी हो शमा जलती रहे...
निगाहें एक दूजे के दिलो तक पहुचे,
हर एक साँस पे कोई आरजू मचलती रहे...
फ़िर कुछ ऐसा हो अपने हाथों में ले के हाथ तेरा...
तुझसे मुहब्बत का में इज़हार करू,
नज़र झुका के तू अपनी रज़ा दे मुझको,,
तुझको बाहों में लू, और तुझको प्यार करू,
तेरी बाहों में आ के भूल जाऊं में,
ख़ुद को, जमाने को, अपने हर गम को...
ऐसा दिलकश हो समा, मुहब्बत की बात चलती रहे...
तू सामने बैठी हो, शम्मा जलती रहे...
तेरे उलझे गेसुओं को सुलझाऊं कभी,
तेरी अदाओं में ख़ुद कभी उलझ जाऊं ,
तेरी आँखों में ख़ुद को तलाश करू,
ये तलाश तमाम उम्र चलती रहे...
तू सामने बैठी हो... शम्मा जलती रहे...
अविनाश ....
तू सामने बैठी हो शमा जलती रहे...
निगाहें एक दूजे के दिलो तक पहुचे,
हर एक साँस पे कोई आरजू मचलती रहे...
फ़िर कुछ ऐसा हो अपने हाथों में ले के हाथ तेरा...
तुझसे मुहब्बत का में इज़हार करू,
नज़र झुका के तू अपनी रज़ा दे मुझको,,
तुझको बाहों में लू, और तुझको प्यार करू,
तेरी बाहों में आ के भूल जाऊं में,
ख़ुद को, जमाने को, अपने हर गम को...
ऐसा दिलकश हो समा, मुहब्बत की बात चलती रहे...
तू सामने बैठी हो, शम्मा जलती रहे...
तेरे उलझे गेसुओं को सुलझाऊं कभी,
तेरी अदाओं में ख़ुद कभी उलझ जाऊं ,
तेरी आँखों में ख़ुद को तलाश करू,
ये तलाश तमाम उम्र चलती रहे...
तू सामने बैठी हो... शम्मा जलती रहे...
अविनाश ....
Thursday, April 30, 2009
तुम्हे याद तोः होगा...
एक रोज़ अकेली राहो पे...
एक फूल तुम्हे मैंने सौपा था ...
वो किसी किताब के पन्नो में...
अब भी महक रहा होगा...
तुम्हे याद तोः होगा...
एक रात तुम्हारे ख्वाबो में
कोई आ के चुपके से लौट गया...
तुम सोच सोच कर हार गई
वो कौन होगा...
तुम्हे याद तोः होगा...
एक रोज़ तुम्हारे होटों पे ...
मैंने अपने होंट रक्खे...
लब खोले बिना सब कह डाला,
दिल ने तेरे सुना होगा....
तुम्हे याद तोः होगा....
अविनाश
एक रोज़ अकेली राहो पे...
एक फूल तुम्हे मैंने सौपा था ...
वो किसी किताब के पन्नो में...
अब भी महक रहा होगा...
तुम्हे याद तोः होगा...
एक रात तुम्हारे ख्वाबो में
कोई आ के चुपके से लौट गया...
तुम सोच सोच कर हार गई
वो कौन होगा...
तुम्हे याद तोः होगा...
एक रोज़ तुम्हारे होटों पे ...
मैंने अपने होंट रक्खे...
लब खोले बिना सब कह डाला,
दिल ने तेरे सुना होगा....
तुम्हे याद तोः होगा....
अविनाश
Wednesday, April 29, 2009
कई दिनों से बिखरा पडा है घर सारा,
मैंने कोशिश भी की येः लेकिन संवर नही पाया,
मेरे ही जैसे इसको भी तेरी आदत सी है,
तेरे जाने के गम से येः भी उबर नही पाया...
मेइज़ पर बिखरे पड़े है कुछ कागज़,
कुछ है खाली, कुछ तेरे लिक्खे ख़त है...
खाली पुर्जो पे है तेरे आंसुओं का खारापन,
तेरे खतों में मेरे लिए मोहब्बत है...
आईने पे धूल जमी है, कभी कभी फ़िर भी...
मुझको इसमें तेरी सूरत दिखाई देती है,
हवा के साथ जब उड़ते है घूनगरु परदे के
तेरी पाज़एब की झंकार सुनाई देती है...
खिड़किया लगती ही
राह तकती निगाहों की तरह,
तुझको आगोश में लेने के लिए है बेताब,
घर का दरवाजा, मेरी खुली बाहो की तरह....
लहराती सीढियां याद दिलाती है अदा तेरी, बांकपन तेरा....
बिस्तर की सलवटों में नज़र आता है...
इठलाता हुआ, इतराता हुआ...
बदन तेरा.........
कई दिनों से बिखरा पडा है घर सारा...
मैं लेकिन इसको सजाऊंगा नही....
तेरी यादें ही जिंदगी का सहारा बस है...
तेरी यादों को कभी दिल से मिटाऊंगा नही....
Avinash
मैंने कोशिश भी की येः लेकिन संवर नही पाया,
मेरे ही जैसे इसको भी तेरी आदत सी है,
तेरे जाने के गम से येः भी उबर नही पाया...
मेइज़ पर बिखरे पड़े है कुछ कागज़,
कुछ है खाली, कुछ तेरे लिक्खे ख़त है...
खाली पुर्जो पे है तेरे आंसुओं का खारापन,
तेरे खतों में मेरे लिए मोहब्बत है...
आईने पे धूल जमी है, कभी कभी फ़िर भी...
मुझको इसमें तेरी सूरत दिखाई देती है,
हवा के साथ जब उड़ते है घूनगरु परदे के
तेरी पाज़एब की झंकार सुनाई देती है...
खिड़किया लगती ही
राह तकती निगाहों की तरह,
तुझको आगोश में लेने के लिए है बेताब,
घर का दरवाजा, मेरी खुली बाहो की तरह....
लहराती सीढियां याद दिलाती है अदा तेरी, बांकपन तेरा....
बिस्तर की सलवटों में नज़र आता है...
इठलाता हुआ, इतराता हुआ...
बदन तेरा.........
कई दिनों से बिखरा पडा है घर सारा...
मैं लेकिन इसको सजाऊंगा नही....
तेरी यादें ही जिंदगी का सहारा बस है...
तेरी यादों को कभी दिल से मिटाऊंगा नही....
Avinash
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